हार

ना हालात यहाँ,दिल के नामाकूल थे,
ना ही किसी सिकन्दर से हारे हुए हैं।

हम तो उनकी,बेज़ार आंखों में उतरे,
दो बूँद के समंदर से,यहाँ हारे हुए हैं।

उन आंखों के अश्क़,बहाऊँ भी कैसें।
जिन आंखों में सपनें,हमने सवारें हुए हैं।

मैं भी कभी उम्र की,दोस्त' उफ़ान पे था;
कर गए तन्हा वही,जिनके सहारे हुए हैं।

साथ चलकर भी,फ़ासला कम न हुआ,
दोष लहरों का हैं,दरीया के किनारे हुए है।

तु उम्रभर अपनी मौजों में रही,क्या जाने'
तेरे अरमानों ने कितने,घर उजाड़े हुए है।

यूँ ही यहाँ किसी को,खुशियाँ नहीं मिलती,
दुआ किसी की हैं,दामन में सितारे हुए हैं।

ग़ुरूर अपनेपन का,तुझसेें भी उतर जाएगा,
वो न होंगे तुम्हारें,यहाँ जो न हमारे हुए हैं।

सबक़ जिंदगी का उम्रभर,जो देती रही मुझें,
आज दो बच्चों की माँ हैं,हम कुँवारे हुए हैं।



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