खिलौना

अब किसी भी बात पे मुझे,रोना नहीं आता। 
दिल से बेहतर बाज़ार में खिलौना नहीं आता। 

माना तु खरीद सकता हैं,हर आराम की चीजें, 
जो आँखो को नींद दे, वो बिछौना नहीं आता। 

तंहाई क्या है किसी, नई दुल्हन से जाकर पूछ, 
जब संदेश खूब आते है,मगर गौना नहीं आता। 

आज सब है उनके पास,लम्बी गारी,ऊँचे दखीचें, 
निगाहें राह तकती है,क्यूँ वो बौना नहीं आता।  

अपने महबूब के नखरें से,भला पड़ेसान रहता है, 
इश्क़ कैसे करता है,जब तुझे सहना नहीं आता।

चिड़ियों को जाल से,खेलने का हुनर हैं आ गया,
चिरिमार् पड़ेसां है,जाल मे कोइ मैना नहीं आता। 

चेहरे की रौनक पर,यहाँ मचलना भी वाज़िब हैं;
दिल को देखने का,भला कोइ आईना नहीं आता।

इस्क करता हूँ मगर' मैं,जुल्फों का गुलाम नहीं हूँ
मुझे किसी के बहाव में,भला बहना नहीं आता। 

वफ़ा किया उनको' यहाँ रही तब भी शिकायत हैं;
क्यूँ हाथ मिलाकर,मुझको छोड़ना नहीं आता। 

ऐ सागर इस जमाने की,दुश्वारियों को समझाकर;
मसलते है वही जिन्हें,ठीक से तोरना नहीं आता।

मैं जो भी लिखता हूँ सब है मेरे महबूब की गजलें, 
वर्ना कल तक मुझे,कुछ भी'लिखना नहीं आता।

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