गुलाब

शुरुआत ये है तो,बता'शबाब क्या होगा।
ए सनम तुझको,भला गुलाब क्या होगा।

खुसबू लिए ख़ुद ही,खिल रही हैं हर घड़ी,
भला तुझसे बेहतर,लाज़वाब क्या होगा।

अपनी आँखों को पढ़ने की इजाजत दो,
हम सिरफिरे है, हमें किताब क्या होगा।

हम गुस्ताख़ है गुस्ताखियां तो करेंगे ही,
तु चांद है,रूठकर आफताब क्या होगा।

मेरी ठोकरों में रहती है यहाँ मंजिले तेरी,
यहाँ शायर से कोई,कामयाब क्या होगा।

लिहाज़ का पर्दा,अगर सभी आंखों में हो
हमारी बच्चियों को,ये नकाब क्या होगा।

अदाओ से खेलने की,नहीं है उम्र तुम्हारी,
शर्बत की उम्र में,भला शराब क्या होगा।

बचपन से बेहतर यहाँ,नहीं कोई दुनिया,
तेरे आगे जुगनू,सूरज,महताब क्या होगा।

ग़ुरूर काफी है आँखों का,जमाने के लिए,
भला चेहरे में तुमको, रुबाब क्या होगा।

वो उसपर मरता है,कोई बात जरूर होगी;
किसी मजनूँ को, हुश्ने-हबाब क्या होगा।

हज़ार दरीया जो खुद में,यहाँ समेटे हुए हैं;
खुद जो समंदर है,उसे शैलाब क्या होगा।

किसी के जुल्फों से,दिल खरोंचा गया हैं;
ए इश्क़ हमें,अब और अज़ाब क्या होगा।

हर शौक़ को,बड़े शौक़ से हैं जीया हमने,
ख़्वाब जिंदगी रहीं,और ख़्वाब क्या होगा।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मरहम

सौभाग्य

उन्वान