ज़िगर
जो हर तरह के साज़िशों से,बहुत दूर रहते हैं,
जमाने की चालाकियों से,ज़िगर साफ रखते हैं।
यक़ीनन शब्दों में वजन,तब जाकर आता हैं
जब परवरदिगार हमपर,नज़र साफ रखते हैं।
कोठे की रौनक को,कोई दहलीज़ पे न लाता हैं;
ख़राब लोग भी यहाँ, अपना घर साफ रखते हैं।
जहाँ खाना,वही पैखाना,ये तहज़ीब जिनकी है;
वही लोग इतराते है कि,हम शहर साफ रखते हैं।
माना बहुत गन्दे है,हमारे गाँव के ये गली कुँचे;
मग़र जो दूर तक फैला,वो नहर साफ रखते हैं।
मेरे दिल के किनारे को तुम,कभी ढूंढ न पाओगे,
इश्क़ सबों से करते है,बस नज़र साफ रखते हैं।
शौके जुनूँ आया है,लिखने का तो'खूब लिखिए,
मग़र' जो शायर होते है,वो बहर साफ रखते हैं।
मेरे हिस्से के तीर,भला किसी को चुभ न जाए
जहाँ से गुजरते है,हम रहगुज़र साफ रखते हैं।
मैं तो सागर हुँ मुझे,सबको साथ लेकर चलना हैं;
आप दरिया है फिर क्यूँ न, बसर साफ रखते हैं।
जब भी दिल से लिखता हुँ,गजल बन ही जाती हैं,
अपनी जुबाँ को,दोस्त' इस क़दर साफ रखते हैं।
जमाने की चालाकियों से,ज़िगर साफ रखते हैं।
यक़ीनन शब्दों में वजन,तब जाकर आता हैं
जब परवरदिगार हमपर,नज़र साफ रखते हैं।
कोठे की रौनक को,कोई दहलीज़ पे न लाता हैं;
ख़राब लोग भी यहाँ, अपना घर साफ रखते हैं।
जहाँ खाना,वही पैखाना,ये तहज़ीब जिनकी है;
वही लोग इतराते है कि,हम शहर साफ रखते हैं।
माना बहुत गन्दे है,हमारे गाँव के ये गली कुँचे;
मग़र जो दूर तक फैला,वो नहर साफ रखते हैं।
मेरे दिल के किनारे को तुम,कभी ढूंढ न पाओगे,
इश्क़ सबों से करते है,बस नज़र साफ रखते हैं।
शौके जुनूँ आया है,लिखने का तो'खूब लिखिए,
मग़र' जो शायर होते है,वो बहर साफ रखते हैं।
मेरे हिस्से के तीर,भला किसी को चुभ न जाए
जहाँ से गुजरते है,हम रहगुज़र साफ रखते हैं।
मैं तो सागर हुँ मुझे,सबको साथ लेकर चलना हैं;
आप दरिया है फिर क्यूँ न, बसर साफ रखते हैं।
जब भी दिल से लिखता हुँ,गजल बन ही जाती हैं,
अपनी जुबाँ को,दोस्त' इस क़दर साफ रखते हैं।
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