हुनर

सुना है तु बहुत अच्छी नौकरी करता है;
क्या यही सुनाएगा,तु बड़े शिखर पर है।

जितना पाया हैं,उसी पर ग़ुरूर पाला है;
समझता है,सारी मंजिले तेरे ही घर पर है।

तेरी हैसियत के इतना,उड़ा कर आया हुँ;
यूँ सागर थोड़े न,आया यहाँ नहर पर हैं।

वो आराम से है चंद कोठिया जो बनाई है;
यहाँ महल बनाकर भी,लोग सफर पर है।

 हाँ बता न क्या है यहाँ पर पहचान तेरी,
सिर्फ मुलाजिम है,थोड़े ही न'दहर पर है।

चंद तारीफों में इस कदर उलझा हुआ है;,
उनको लगता है,वही सबकि नज़र पर है।

सियासत में आ गए है,शायद ख़राब लोग;
तभी'हर भला आदमी,आज रहगुजर पर है।

सभी नाक़ाबिल लोग,काबिज़ ओहदों पे है;
सवाल जितने भी है,सब यहाँ हुनर पर है।

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