जवानी

यहाँ मासूम बचपन की,दहलीज़ पर,
अपनी मिसालें-जवानी छोड़ आए हैं।

हमनें जब भी चाहा हैं किसी को,जरूर'
कोइ चाहत की निशानी छोड़ आए हैं।

ये चाँद,सूरज से हमें क्या लेना,हम तो'
गावँ में फिज़ा,आसमानी छोड़ आए हैं।

हमें काम का हवाला देने वालो,हम तो'
तेरे मुन्नों के वास्ते नई कहानी छोड़ आए।

दरीया की दोस्ती पे ग़ुरूर पाले हो,हम'
आंखों में'समंदर इतना पानी छोड़ आए हैं।

जितनी फिज़ा में यहाँ,रंगनियत नहीं है,
हम उतनी अदाओं में,रवानी छोड़ आए हैं।

जो मेरे दिल से खेलते रहें,इश्क़ ऐसे किया;
उनकी दहलीज़ पर,जिंदगानी छोड़ आए हैं।

जबतक रहें साथ,पाँव जमीं रखने न दिए;
मलाल उसे है,क्यूँ मेहरबांनी छोड़ आए हैं।

इक फूल पर भला तु, जाँनिसार हो गया,
हम अपनी राह में,बाग़वानी छोड़ आए हैं।

अब मेरी बातों की,दुनीया तामील करती हैं,
इशारो की हरकतें,बचकानी छोड़ आए हैं।

लहरों से खेलने की,नहीं है अब उम्र हमारी,
पटाखों की उम्र में,ये नादानी छोड़ आए हैं।

वही मुझें आजमाँ रहा हैै यहाँ,जिसके ख़ातिर'
हम अपनी विरासत,मेज़बानी छोड़ आए हैं।

नजरों के गुरुर से अब,भला हमें क्या लेना,
अब हम हर नफ़ासत,निगेहबानी छोड़ आए हैं।

अब किसी बात पे,उनसे सवालात क्या करना,
वो सारी आदत,अपनी खानदानी छोड़ आए हैं।





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