ठिकाना

अब तुम बुरा मानो या भला,मग़र'
मैंने बदल दिया,अपना ठिकाना हैं।

लड़ाई से मुझे कतई गुरेज़ नहीं,मग़र'
शागिर्दों की बस्ती में नहीं जाना हैं।

भले उड़ने का हुनर,हमें मालूम न हो,
जब भी हो,चट्टानों से ही टकराना है।

अब इन हाथों से,कभी खंज़र न उठेंगे;
उनके नाम की मेहंदी जो लगाना हैं।

मोहब्बत है,तुझे अग़र दीवानगी भी है;
तो'भला किस बात का आजमाना हैं।

अब उनकी ही राह में बिछना है,मुझे'
जिस राह से होकर,सनम को जाना है।

इस राह में पैर के,तु नासूर न देखा कर;
ये इश्क़ है,तुझे खंज़र से भी पार पाना हैं।

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