निग़ाह

मैं कैसे मानू,तेरी महफ़िल में' मेरी बात चलती नहीं हैं।
अब हम वहाँ नहीं जाते,निगाह जहाँ संभलती नहीं हैं।

भाव चेहरें के ही,यहाँ सबकुछ बयाँ कर देते हैं,सनम'
अदा ख़ूब बदलती है,मग़र रंग तु अभी बदलती नहीं हैं।

दिल ने अब ये मान लिया हैं, तु अब हो गई है बाज़ारू;
तु महबुब हज़ार बदल,ये बात मुझे अब खलती नहीं हैं।

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