मेहरबानी

उनकी आँख में आया इतना पानी न होता।
दिल का रिश्ता हुआ,अग़र जिश्मानी न होता।

मैं सच में'किसी फुटपाथ पे,तुझे खड़ा मिलता;
मेरा दुश्मन मुझे मिला,अगर खानदानी न होता।

समंदर से पूछ बैठा कोई,तु इतना खारा क्यूँ हैं,
मैं मीठा होता,तो मेरी लहरों में रवानी न होता।

दर्द-ए-इश्क़ हम तेरा,सबकुछ सह लेते सनम;
बात मैं अपनी सुना,औरों के जुबानी न होता।

कामयाबियो की इबादत,सिर्फ़'लिखी जाती तो
दिल की राह में आज इतना, कहानी न होता।

तु पैगम्बर,चाहें ख़ुदा,चाहें मिशाल बन जाती मग़र;
अधूरी तब भी रहती,कोई दिलवरजानी न होता।

मुफ़लशी के दौड़ में ही,सच्चा इश्क़ पनपता हैं;
गरीबों का इश्क़'इश्क़ रहता है,मेहरबानी न होता।

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