दीयाँ

तेरी दिए गमों पे,दोस्त'इतरा रहा हुँ मैं।
देख स्याह होकर भी,मुस्करा रहा हुँ मैं।

तेरे उजालों में,यक़ीनन खो गया था कहीं;
अपनी बस्ती का,कभी दिया रहा हुँ मैं।

मेरे सुख़नवर,तुझको यह एहसास नहीं;
तु जब कस्ती थी,तब भी दरिया रहा हुँ मैं।

जब तु तलाश रहीं थी,यहाँ अपनी जमीं;
दुनीयाँ की निगाहों में,आसमाँ रहा हुँ मैं।

सुना हैं,कुछ लोग मेरे शब्दों को आकेंगे;
जिनकी गज़लों का,यहाँ मकाँ रहा हुँ मैं।

ये कौन सी नई बात,भला कह दिया तुमने,
कि सागर से पहले,महज़ दरीया रहा हुँ मैं।

वफ़ा किया तो किसी ने ख़बर तक न ली;
आज ख़बर में हैं,जबसे बेवफ़ा रहा हुँ मैं।

मेरे शब्दों ने तब जाकर,आकार लिया हैं;
शायरी बनी है,जब ख़ुद से खफ़ा रहा हुँ मैं।

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