लोग

हमारी ही पनाह में आयेंगे,हमसे रूठे हुए लोग।
अक्सर इतिहास बदलते हैं;साहेब टूटे हुए लोग।

शहर तो'वक़्त के साथ,साहेब' सब भूल जाता हैं;
गाँव राह तकता हैं,कब आयेंगे'हमसे छूटे हुए लोग।

उंगलियाँ थाम कर चलते थे,फिर भी' गिर जाते थे;
भला जो आज इतराते हैं,अपने बलबूते हुए लोग।

परिंदा लाख उड़ ले,मग़र'घोषले में आना पड़ता हैं;
आँखिर'मिट्टी में ही मिलते हैं, मिट्टी से उठे हुए लोग।

किसी की नेमतों से साहेब'तुम,इतने आबाद हुए हो।
मंजिल की राह में बहुत हैं,मंजिल से रूठे हुए लोग।

खरीदकर डिग्रियाँ जो हैं,अपनी तक़दीर बनाने वाले।
सुना हैं सच्चाई बयाँ करेंगे,जमानें में'झूठे हुए लोग।




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