ऊँचाई
मुझको मेरी ऊँचाई से,वो गिरा कैसे देगा।
तु दरियाँ हैं,भला समंदर को'हरा कैसे देगा।
मेरे शब्दों से अक्सर,यहाँ सरकारें बदली हैं;
मेरी बातों को,यूँ ही हवा में उड़ा कैसे देगा।
जिसने सावन को,पतझड़ जैसा जिया हो,
उसको ये मौसम,साहेब' दगा कैसे देगा।
सच के सायें में,यक़ीनन परेशानियां तो हैं;
फिर भी'कोई झूठा मुझें,मिटा कैसे देगा।
जब भी कुचले गए,हम यहाँ और निखरें हैं;
मेरी शख्शियत को भला,तु दबा कैसे देगा।
निगाहें मेरी दहलीज़ के,अंदर भी देखती हैं;
तीर चुपके से,कोई हमपर'चला कैसे देगा।
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