आदमी
बेतहाशा भीड़ हैं,मग़र' कोई आदमी नहीं हैं।
आसमाँ तक पहुँच तो हैं,पैरों तले जमीं नहीं हैं।
अमीरों की जुबान यहाँ,हमेशा खाली रही हैं;
गरीबों से ही सुना है,मुझें कोई कमी नहीं हैं।
अपनी ग़ुरबत को ही,जीने का सहारा बनाते हैं;
हज़ार शिकायत हैं,मग़र'आंखों में नमीं नहीं हैं।
वक़्त इसी ख़्याल में गुजरा,तुम साथ तो होते;
दिल मिलते जहाँ,ना पूछ'क्या हमनशीं नहीं हैं।
नाज़ुक दिल से यहाँ, मतलब के रिस्ते बनाना;
तुम्हीं बताओ न सनम,क्या ये गोकशी नहीं हैं।
भुलाकर साथ चलनें की, अब जरूरत क्या हैं;
अग़र रहा दिल में नहीं,तो फिर'तु कहीं नहीं हैं।
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