दोस्त

ए सूरज तेरी रोशनी में,उसको नहाना आ गया।
महबूब मिला ऐसा,के ठोकरों में जमाना आ गया।

इस तरह आजकल,तरक्की कर रहा हैं ईश्क़ में'
पहली चरण में,हाथ लड़की का दबाना आ गया।

कलतक जो दोस्त,उधारी चाय की सधाता न था,
संगते-ईश्क़ में'बिल रेस्टुरेंट का चुकाना आ गया।

कभी रहा नाज़ था हमकों,हमारी यारगी पे दोस्त;
हाथ लड़की का थामा,तो' नज़रें चुराना आ गया।

दिल हुआ छोटा साहेब,यहाँ इस कदर मेरे यार का;
हज़ार रिस्ते तोड़कर,इक रिश्ता निभाना आ गया।

खफ़ा जो कभी होता नहीं था,किसी बात पर मेरे;
अदायें ईश्क़ में उसे,अब रूठना-मनाना आ गया।

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