मर्द

 सिर्फ़ कुदरती वनावट से,

क्यों कोई तुम्हें मर्द समझें।


किसी का दर्द समझा हैं,

कोई तेरा भी दर्द समझें।


जमानें कुछ भी समझें हमें 

अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता;


मज़ा तो तब है यहाँ, जब'

वो भी मुझें हमदर्द समझें।


मैं आँखरी चाल में भी,

यहाँ दाँव पलट सकता हूँ;


पड़ी है जो गर्द हमपर,

उसी से ना हमें गर्द समझें।


सिर्फ हवाओं के चलने से;

यहाँ मौसम नहीं बदलते।


हो जब आँख में आँसू,

तभी फिज़ा को सर्द समझें।

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