इंतहा

इस जमाने मे,मेरे दोस्त'इंतहा कुछ भी नहीं हैं।

जिंदगी चंद ताल्लुक के सिवा कुछ भी नहीं हैं।


जरूरी हो कोई बात तो'सभी की रखी जाए;

मग़र यहाँ गैरजरूरी फलसफ़ा,कुछ भी नहीं हैं।


हक़ीककत अभी ज़माने की,तुमनें देखी कहाँ हैं;

यक़ीनन हुआ जिंदगी से सामना,कुछ भी नहीं हैं।


पैर के धूल भी बनते हैं,इक रोज माथे के चन्दन;

होता वक़्त की जादूगरी से बड़ा, कुछ भी नहीं हैं।


तुम्हारा तुम देखों,हमारा हम देखेंगे'हर रिस्ता

बाद में हैं कहता'तुमनें किया,कुछ भी नहीं हैं।


दोस्त,ईश्क़,हार,ब्यापार,कोई हुनर बाकी रहा;

यकीं मानों अभी तुमनें जिया,कुछ भी नहीं हैं।


हस्र हैं आज ख़ुदा,यहीं देख यहाँ तेरे बंदे का;

मिल जाए अगर महबूब,तो'ख़ुदा कुछ भी नहीं हैं।


ये तो फ़र्ज़ था हमारा,जो हम उम्रभर निभातें रहें;

वर्ना'रहा कभी तुमसें,मुझें आसरा कुछ भी नहीं हैं।


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