हिम्मत

 ये सच हैं, अब उतनी मोहब्बत नहीं रहीं।

मग़र'तेरे बग़ैर जीने की,आदत नहीं रहीं।


तुम्हीं मनाओं,भला यह प्यार का मौसम;

मेरे दिल को अब इतनी,फुर्सत नहीं रहीं।


कहाँ जायेंगे,ये जज्बातों का शहर लेकर;

तुम नहीं रहें,तो'इसकी जरूरत नहीं रहीं।


अब अच्छा लगता हैं मुझें,बेज़ार मौसम;

जबसे सादगी की मुझें,शोहबत नहीं रहीं।


यूँ तो रोक सकता हुँ मैं,यहाँ तुफ़ाँ का रस्ता;

राह तेरी रोकूँ,मुझें इतनी हिम्मत नहीं रहीं।


हैं प्यार कितना ज़माने को,समझ आया;

 दौलत नहीं रहीं,तो'कोई इज्जत नहीं रहीं।




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