काम

 उम्र रहते सभी को,ये मुक़ाम क्यूँ नहीं मिलता।

एक ही उम्र में,मोहब्बत और काम क्यूँ नहीं मिलता।


साथ सोकर भी,उसके दिल को सुकूँ नहीं आया;

मैं परेशान हुँ,अब उनका सलाम क्यूँ नहीं मिलता।


अगर तुमको देना ही सबको,ईश्क़ का ज़ख्म ख़ुदा;

तू ही बता न इसका,यहाँ बाम क्यूँ नहीं मिलता।


आज घिरा रहता हुँ मैं,जमाने के रंगीनीयत के बीच;

मग़र वो तेरे दामन का सुकूँ,आराम क्यूँ नहीं मिलता।


चार पैसें कमाकर भी,फिर'वही ईश्क़ ही करना हैं;

पढ़ाई के साथ इसका भी,इन्तज़ाम क्यूँ नहीं मिलता।




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