रिश्वत

 एक अजब तिश्नगी हैं, रूह परेशान है साहेब।

शहर मशगूल हैं,और यहाँ गावँ हैरान है साहेब।


आदमी अब आदमी की,रहा भीड़ में ही नहीं हैं;

सच किनारे खड़ा हैं, होकर बेजुबान हैं साहेब।


यूँ तो दर्द बाँटने की,सरकार की स्कीमें बहुत हैं;

कमीशन चाहिए,कहते वो सीना तान हैं साहेब।


कौन खाता हैं,और कौन यहाँ नहीं खाता हैं;

थाली बताती है,किसको कितना ईमान हैं साहेब।


गरीब के बच्चें भी जब,कुर्सियों पर काबिज़ हुए हैं;

रिश्वत माँगते हैं,सिस्टम का यही विधान हैं साहेब।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मरहम

सौभाग्य

उन्वान