शर्म

माँ की नेकदिली,पिता का अहम बेच आए हैं।
शहर गए थे जो गाँव के बच्चें,शरम बेच आए हैं।

यूँ तो करनी तैयारी,घर की हकीक़त बदलने की;
शिक्षा की आर में लेकिन,लिहाज़,धर्म बेच आए हैं।

अब हर बात पर उनको,यहाँ समझाना पड़ता हैं;
वो अदब,वो सलीका,सारी बातें नरम बेच आए हैं।

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