सर

कंधे बड़े नाज़ुक थे,उनपर सर रख नहीं पाए।

जो अमीर थे बच्चें,पिता का घर रख नहीं पाए।


यूँ तो ख़बर रहती थी,यहाँ उनको जमानें की;

मग़र अपनें बच्चों पे,वो नज़र रख नहीं पाए।


शहर जाकर,कुछ इस कदर'मशगूल हुए बच्चें,

यूँ तो खुद बस गए,पिता को शहर रख नहीं पाए।


बस इतनी शिकायत हैं, मेरी शहर जानेवालों से,

क्यूँ वो जाकर शहर,गाँव की ख़बर रख नहीं पाए।


मैंने महबूब को लिखा,तो'यहाँ ख़ूब हुई गज़ल;

पिता को लिखना चाहा,तो'बहर रख नहीं पाए।


माँ से जब भी मिला,चिंता रही सिर्फ़'उसको मेरी,

बात नाकाफ़ी रही,हम अग़र-मग़र रख नहीं पाए।


यूँ बंदिशें अच्छी नहीं लगी,कभी उस उम्र में हमें,

घर से जो दूर हुए,तो'घर का हुनर रख नहीं पाए।


कभी इक घर में पलता था,4 भाईयों का परिवार;

बच्चें इतने मॉडर्न हुए की,एक मेहर रख नहीं पाए।


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