कमी
बिछड़कर दोनो को,मग़र' कमी खलेगी।
मुझें आसमान खलेगा,तुझें जमीं खलेगी।
किसी का होकर भी,कीसी का न हो पाना;
यकीन हैं इन दस्तानों में,ये जिंदगी खलेगी।
बदलकर भी तुम अभी,बदल न पायी हो;
बेवफाई में भी तुझें,मेरी आशिक़ी खलेगी।
रुलाकर हमें आज,जा रहीं हो भलें मग़र'
तेरी महफ़िल में,सबको मेरी हँसी खलेगी।
सभी को यहाँ,नयी अदाओं का लगाव हैं;
ईश्क़ पुराना होगा,उसे तु हमनशीं खलेगी।
इक रिश्ता दिल का,तुमसें निभाया न गया;
कौन संभालेगा जब,आँखों की नमीं खलेगी।
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