सिहरन

 डर जाते है,उठ जाते है,सिहर जाते हैं।

जब भी तेरे ख़यालों में,हम उतर जाते हैं।


दिन के सायें में जितना,समेटा करते हैं

रात तन्हाई में,उतने ही' बिखर जाते हैं।


मिलकर भी किसी से,अब मिल नहीं पाते;

इतने खोए रहते है,जब हम घर जाते हैं।


पिता परेशान हैं,माँ अब हैरान रहती है;

फूल मांगा जाता है,लेकर पथ्थर जाते हैं।


ना बनाइए साहेब,समंदर से यहाँ रिस्ते;

किनारों के घर,तो'आँखिर में उजड़ जाते हैं।


बादस्ता जारी हैं, मेरी गाँव का जमघट;

खबर आज भी बनती है,वो किधर जाते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मरहम

सौभाग्य

उन्वान