नज़र

 हर बेज़ार मौसम,शोख़ नज़र बन जाता हैं।

जो उससे मिलता हैं,वो खबर बन जाता हैं।


हम जब तेरे ख्यालों से,निकलना चाहते हैं;

नज़र पड़ती हैं,ख्यालों का शहर बन जाता हैं।


ताल्लुक भाँपकर,मिलते हो जहाँ के लोग;

यक़ीनन ईश्क़ का,वहाँ भी असर बन जाता हैं।


जज़्बात निकालिए,कोई अगर दिल में हो;

एक अदद उम्र के बाद,ये ज़हर बन जाता हैं।


गला काटना,हराम का भी करना पड़ता हैं;

कौन कहता हैं साहेब'यूँ ही घर बन जाता हैं।


दिल की राह में,यूँ अपनी शेख़ी न बघारिये;,

ये ईश्क़ है,इसमें बाज़ भी कबूतर बन जाता हैं।

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