पहचान

 इतना बदला की,पहचान में नहीं आता।

जो पूरा है कभी,अभिमान में नहीं आता।


जो कहता था बनें है,हम इक-दुजें के लिए;

दोस्त वही मिलनें,मेरे दालान में नहीं आता।


यूँ तो घर में क्यारियाँ,सजा रखी हैं हमनें;

अब फूल कोई भी,फूलदान में नहीं आता।


बच्चे की फी,बीबी की साड़ी का ख्याल हैं;

बस माँ की दवाई का,ध्यान में नहीं आता।


किताबों का समंदर लांघकर,साहेब हुए हैं;

मग़र जिंदगी क्या है,इम्तेहान में नहीं आता।


बुजर्गो का हाल पूछा करों,और क्या दोगें;

जो खुद बरगद हैं,सायबान में नहीं आता।


पथ्थर की चोट, जमाने को नज़र आती हैं;

कोई फूल से खरोंचे,निशान में नहीं आता।



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