कलन्दर

 कुछ इस तरह,मोहब्बत के मंजर रहें।

प्यास बुझ न सकीं, पास समंदर रहें।


हाल दिल का तुझें क्या,बताते सनम;

तुम जितनें बाहर रहें, उतने अंदर रहें।


ये ख़्याल था,प्यार मुझें हो न सकेगा;

दिल के मामलें में हम भी,कलन्दर रहें।


दौड़ चाहतों का जल्दी,गुजर ही गया,

फूल था जिन हाथों में,अब खंजर रहें।


खिल गए फूल,सारे यहाँ कुचलें गए,

बच गए वही जो,कोपलों के अंदर रहें।


दर-दर की ठोकरें,वो खा रहा है यहाँ;

जो अपनी सियासत के,सिकन्दर रहें।

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