शायरी
नादान परिंदों को भी,अब रायशुमारी आ गयी।
मैं उसको लिखता रहा,मुझको शायरी आ गयी।
मैं कितना अंजान हुँ उससे,मालूम चला तब;
जब मेरे हाथ मे उसकी,लिखी डायरी आ गयी।
दिल की बात जब भी,हमनें बताना चाहा उसे;
बीच में'उसकी ख्वाइशें,मेरी लाचारी आ गयी।
मिलने का सलूक यूँ भी,जमाने को मालूम न था;
ये कैसी हवा चली,दूर रहने की बीमारी आ गयी।
जरूरतों के साथ,अब यहाँ इतने ढ़ल गए है वो;
मौकापरस्ती करनी उसे झूठी तरफ़दारी आ गयी।
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