रिस्ता
ताल्लुक़ दिल से,मैं तुमसें बाबस्ता रखूँगा।
जिंदा रहूँगा,तभी तो'कोई रिस्ता रखूँगा।
अभी दौड़ मिलने का नहीं हैं,ए मेरे हमदम;
मैं ख़ुद सफर में हुँ,बता'तुझें कहाँ रखूँगा।
जो बात मुनासिब नहीं,वो भी कहीं जाएगी;
इल्ज़ाम खुद पर मैं कितने,मेहरबाँ रखूँगा।
फ़र्क़ इतना हैं उसकी,और मेरी मोहब्बत में;
वो बनाएगा महबूब, बनाकर ख़ुदा रखूँगा।
तुम गफ़लत में न रहना,मेरी तहजीब ऐसी हैं;
जबतक जिंदा हुँ,तुझें खुद में जिंदा रखूँगा।
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