बेजुबाँ
ना कोइ दुआ लगी,न कोइ दवा लगीं।
जिसको भी मोहब्बत की,हवा लगीं।
दिखा कुछ भी नहीं था,आईने में उसे;
चोट दिल में न पूछ,कहाँ कहाँ लगीं।
पहली नज़र में तो,जो बावली सी थी;
दूसरी नज़र में वही,उसे दिलरुबा लगीं।
बात आँखों से हुई,लब खामोश ही रहें;
बहुत बोल गई,जो सबको बेजुबाँ लगीं।
इन आँखों पे ईश्क़,छाया था इस कदर;
हर बार मिलकर,वो पहली मर्तबा लगीं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें