काबिल
कभी समंदर नहीं,तो'कभी साहिल नहीं समझा।
मैं हुँ नहीं काबिल,अगर तुने काबिल नहीं समझा।
पिता नौकरी में थे,मैं अच्छी नौकरी करता हुँ;
किस काम का हैं ये जब,तेरा दिल नहीं समझा।
के वार दिल पे किया उसनें,दिल के मरीज़ पर;
दिल में वो भी था,ये मेरा क़ातिल नहीं समझा।
बतातें किसको भला,अपना हाल-ए-दिल बयाँ;
मेरा दर्द,रहा जो दर्द मेरे,शामिल नहीं समझा।
मोहब्बत पे तोहमत लगें, ये मुझें मंजूर न था;
बात अपनी कह गए,मेरा मुश्किल नहीं समझा।
सुकूँ के वास्ते,दो दिलों का मिलना काफी हैं;
सच में हैं क्या करना,तुनें हासिल नहीं समझा।
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