क़िताब
बेमतलब उसूलों की,क़िताबों की दुनीयाँ।
कभी तो होगी,अपनें हीसाबों की दुनीयाँ।
जिंदगी के दौर में,इतनें आगें निकल गए,
कहाँ गया वो बचपन,ख्वाबों की दुनीयाँ।
अब हर चेहरें में,यहाँ इक चेहरा लगा हैं;
हैं रंगते बदलती,ये नक़ाबों की दुनीयाँ।
हम शाख़ के पत्तें हैं,इक दिन झर जायेंगे;
तुमको ही मुबारक़ हो,गुलाबों की दुनीयाँ।
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