सिख रहा हुँ।

 दूर रहकर भी,रिस्ता निभाना सिख रहा हुँ।

बग़ैर तेरे मैं,यहाँ मुस्कुराना सिख रहा हुँ।


कल जो बात तुमनें कहीं थी,मुझें हल्के में;

उसी राह पे,मैं खुद को चलाना सिख रहा हुँ।


मोहब्बत ये भी है,के ज़िद नहीं किया जाए;

ढ़लकर तुझमें,अपना बनाना सीख रहा हुँ।


अभी जिंदगी मेरी वास्ते,मोहरें सजा रही हैं;

अभी तो जिंदगी का,ताना-बाना सिख रहा हुँ।


जहाँ ठोकरें हैं,उसी राह से हैं मेरी मंजिल;

गीरकर मैं वही से,आना-जाना सिख रहा हुँ।

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