साहेब

 गिला काँटों से नहीं,हैं गुलाब से साहेब।

कितनें बदलें जमानें के,हीसाब से साहेब।


Fb, whatsup से कुछ नहीं होने को हैं;

बदलेगी किस्मत यहाँ, किताब से साहेब।


जज़्बाती रिश्तों में ज़रा,उतरकर तो देखिए;

आँसू में जलन ज्यादा है,तेज़ाब से साहेब।


तुम्हारा आना भी,इतना बेकस गुजरा हैं;

कितनें मर गए ख़्वाब,तेरे ख़्वाब से साहेब।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मरहम

सौभाग्य

उन्वान