ईमान

 हम बंदर हैं इस खेल के,सिर्फ वक़्त ही मदारी हैं।

कोई नाच रहा हैं शौक़ से,किसी पे ज़िम्मेदारी हैं।


ए हुजूम में झंडे उठानें वाले,ज़रा गौर से सुनों;

मैं आज कुचला गया हुँ,तो'कल तेरी भी बारी हैं।


भाई की झूठी वसीयत,अब तलक थामें हुए हो;

अब क्या तुम बताओगे,यहाँ क्या मक्कारी हैं।


जाकर झूठ को कह दों,अपना दम लगाकर देखें;

नुकसान लाख हो,सच मे'देनी हमें हिस्सेदारी हैं।


पैसा जरूरतों तक हो,हुनर की क़ीमतें समझों;

अगर हो जाए ईमान पे भारी तो'इक बीमारी हैं।

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