कुनबा
अबतक संभाला था जो,मेहरबाँ बिखर गया।
तुम गए ऐसे की सारा,कुनबा बिखर गया।
लानत है अपने आप पर,के ये सब देखना पड़ा;
घर भी बिखर गया,उनसें भी रिस्ता बिखर गया।
बनाने चलें थे दीवार हम,दूसरों के छत के सायें में;
अपनी गलतियों से आए-दिन,दास्ताँ बिखर गया।
चेहरा तराशा ख़ूब,मग़र रूह तराशा नहीं गया;
हुई उम्र तो,सबकुछ आहिस्ता-आहिस्ता बिखर गया।
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