देखा

 चेहरा नहीं,हुनर नहीं,ज़िगर नहीं देखा।

क्या देखा ग़र तुमनें उसे,जीभर नहीं देखा।


जहाँ तक मिलें तुम्हें,सादगी पसंद लोग;

समझना'गाँव है,तुनें अभी शहर नहीं देखा।


ताक़ में रही उम्र,जिसके एक नज़र के लिए;

उसनें पलटकर हमें,यहाँ इक नज़र नहीं देखा।


सिसकियाँ जिनके छाँव तलें,खिलखिलाने लगें;

मिला न हो ऐसा घर,तो'तुमनें घर नहीं देखा।


ख़्वाब इतने थे की,वो हर बार ही छला गया;

हमनें फूल की तलाश में,राह का पथ्थर नहीं देखा।


मिला अगर बसंत,तो'यही जिंदगी का अंत नहीं;

बयाँ जिंदगी न करीए,ग़र पतझड़ नहीं देखा।

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