शिकायत

 मेरे खुले जख़्मों को देख,आदतन बांधता तो हैं।

वो मेरी शिकायत करता हैं,चलों जानता तो हैं।


मोहब्बत अब भी हो सकती है,ग़र ख़ुदा चाहें;

मैं ख़ुदा के भरोसें हुँ,वो ख़ुदा को मानता तो हैं।


मना करने से पहलें, उसनें मेरा नाम पूछा था;

चलो जो कल दिल मे उतरा था,पहचानता तो हैं।


वो मुझकों देख अक्सर,यहाँ बचकर निकलती हैं;

ईश्क़ है तभी,खुद को'इतना,जो संभालता तो हैं।


अग़र तुम साहेब हो गए,तो'पापा मान भी सकतें हैं;

रोज नए सपनें दिखाकर मेरा ईश्क़,टालता तो हैं।

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