आराम
इतना सब्र,इतना एहतेराम कहाँ से लाता हैं।
तू अपनें दिल को,आराम कहाँ से लाता हैं।
ऐ ईश्क़ मैं अब भी,बहुत हैरान हुँ तुमपर;
रोज लुटता है,नया मुकाम कहाँ से लाता हैं।
सख़्त,पर्देदार,उसुलपरस्त,यहाँ सब लूटें हैं;
इतना हौसला,सुबहों-शाम कहाँ से लाता हैं।
वो बीमार है,तो'घुटन हमें भी महसूस होती हैं;
ग़ैर की क़ुरबत में,इतना पयाम कहाँ से लाता हैं।
जिसें यहाँ ज़र्दे से भी,बहुत परहेज़ था कभी;
बता'तू उनके हाथों में,जाम कहाँ से लाता हैं।
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