रास्ता

 महंगा नहीं हम,कोई राह सस्ता निकाल लेंगे।

तू बेफिक्र रह,हम मिलनें को रस्ता निकाल लेंगे।


माना'रहा चिठ्ठियों का दौर,अब नहीं हैं ज़ानिब;

हम क़िताब बेचकर,मोबाइल का खर्चा निकाल लेंगे।


ये जुनूनी आशिक़,ख़ुद भलें ही फेल हो जाए;

मग़र महबूब के लिए,एग्जाम का पर्चा निकाल लेंगे।


पिता के ख़्वाईश पर,जो'रिजल्ट निकाल नहीं पाए;

महबूब की बात पर,कलेजा,गुर्दा निकाल लेंगे।


और हमारें बुज़ुर्ग, मोहब्बत पे भलें नाराज़ होंगे खूब;

दिखेगी लड़की,तो'साफ़ करने को चश्मा निकाल लेंगे।


नए जमानें के आशिक़ों की,रफ़्तार इतनी हैं;

मिलेंगे आज और कल लड़की से रिस्ता निकाल लेंगे।


अब तुम्हीं बताओं,और किस तरह सँवरना हैं मुझें;

हम कैसे पकी दाढ़ियां,चेहरें की झुर्रियां निकाल लेंगे।

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