बहाना

 रिस्ता छूटें तो'यक़ीनन,कोई बहाना होता हैं।

वो चला ही जाता हैं,जिसकों जाना होता हैं।


ये बात ज़रा तुम समझों जी,शब्द भी मेरे टूटेंगे;

ईश्क़ में शब्दों को,दिल का भार उठाना होता हैं।


फ़िर याद तेरी आ जाए,फिर कैसें तुमकों ढूँढुंगा;

आँख ग़र जागें भी,तो'ज़िशम को सुलाना होता हैं।


इक भूख हमारी रहती हैं,तब जाकर ये मिटती हैं;

दूर तलक ही रहकर जब,तेरे मुँह में खाना होता हैं।


जो बात तुम्हारी मानें,वो यहाँ हरगिज़ तेरा हैं नहीं;

जो तुझसें भी लड़ जाए,वो महबूब सयाना होता हैं।


पहलें खुद को खोना हैं,फिर दिल से उनका होना हैं;

दिल ही ये समझता हैं, क्या ईश्क़ निभाना होता हैं।

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