गज़ल

जख़्म हरा और,आंखें" जिनकी सजल न हुई।
वो भलें लाख़ लिखें,उनसे मग़र"ग़ज़ल न हुई।

मेरे बग़ैर बहुत जतन किए थे,उस लड़की ने;
मेरी खुशबू से न गुजरी,तो'फिर"कमल न हुई।

आज भी उलझी हैं वो लटें,जो सुलझाई थी कभी;
हमने छोड़ा तो फिर"वो लटें,कभी सरल न हुई।

आँह से सींचा,आसुओं से वो बोया गया होगा;
यक़ीन मानिए,यहां यूँ ही उम्दा नश्ल न हुई।

ये तो वहम है कि,यहाँ तू भी"महल था कभी;
आज खंडहर है,और खंडहर फिर महल न हुई।

आंखरी दौड़ था,एग्जाम हुआ,कॉलेज बदल गए;
बस इत्ती बात पे,इश्क़ की पहेली हल न हुई।

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