मुशलमाँ

 तुम्हें मालूम भी नहीं,की तुम क्या कर दोगें।

इस काफ़िर को सनम,मुसलमाँ कर दोगें।


बुरे लोगों को भी यहाँ,जन्नत मिल जाए;

तुम हाथ उठाकर,अग़र'दुआ कर दोगें।


हमसें पूछों न मोहब्बत की ताबीर सनम;

तुम चाहोगें,तो'काँटे को गुलिशतां कर दोगें।


मुझें भरोसा हैं,यक़ीनन तुम आओगें एक दिन;

और मिलकर मेरा गम,सब हवा कर दोगें।


तुमसें पहलें यहाँ हम,बहुत तन्हा थे कभी;

अब मिलकर बिछरोगें,तो'और तन्हा कर दोगें।

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