लड़किया

 रहकर चारदीवारी में,सारी दुश्वारियां समझती हैं।

लड़किया वो फूल हैं, जो दर्दे_क्यारियाँ समझती हैं।


अपने खुशबू के कारण ही,अक्सर मसली जाती हैं;

पिता के बोझ को,मां की हर इक लाचारियां समझती हैं।


यूं तो बहुत नाज़ुक होती हैं,ये जमाने की नजरों में;

मगर घर की मर्यादा,गुरुर,हर बेकरारिया समझती हैं।


अगर न हो लड़कियां तो,हर युग इक महाभारत हो;

दुर्योधन कैसे संभाला जाता हैं,ये गांधारियां समझती हैं।


हैं ये ईश्वर की ज़माने को,दी हुई अनमोल धरोहर सी;

किसको कितनी देनी हैं,हर इक देनदारियां समझती हैं।


बहन बनकर कभी भाई की,यहां आरती उतारती हैं;

मां बनकर ये घर की,सारी जिम्मेदारियां समझती हैं।


न होते गालिब न रसखान,न होते शब्दो में इतने बखान;

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