मकान
पिता की दौलत, अपना गुरुर सम्मान दे दें।
तू चाहता क्या हैं,दिल के बदले हम जान दे दें।
जो लड़की कहती थी,रह लूंगी छोटी खोली में;
कोर्ट में कह रही थी,शहर वाला मकान दे दें।
कब तलक चुकाऊंगा मैं,यहां कर्ज मोहब्बत का;
वकालतें डायवोर्स दे,या पति का भी लगान दे दें।
अभी महिनें चार गुजरें,और घुटने पर आ गई हैं;
जो रोज कहती थी,जाकर उसे मेरा फरमान दे दें।
रिस्तेंदार खूब होते हैं,एकदम से कुत्ते के माफिक;
चाहतें है रिश्तेदार उजड़े तो,हाथों में गिरेबान दे दें।
अक्सर वही दे देते है मशवरा,जो बेकार बैठे हैं;
कीमती लोगों को कहां फुर्सत,किसी को ज्ञान दे दें।
होता हर घर में एक निकम्मा,सबकी कमाई खानावाला;
वही चाहता है घरवालें उसे,तमगा-ए-हिंदुस्तान दे दें।
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