नजर

 वो ईश्क से इक नज़र कर देगी।

अच्छे अच्छों को,दर-बदर कर देगी।


अपनी ऊंचाईयों पे,गुरुर है तुमको;

वो बस छूकर ही,तुम्हें नहर कर देगी।


मैं उससे शाम को मिलता ही नहीं हूं;

इतना दिल लगाएगी,दोपहर कर देगी।


उसकी पनाह में जीने का मौका तो मिलें;

वो फुटपाथ को भी,आलीशान घर कर देगी।


गांव के जिस मोड़ से,वो रोज गुजरेगी;

मेरा दावा है उसको भी,शहर कर देगी।


ये है मेरे महबूब की, रहनुमाई का आलम;

जिस तरफ से गुजरेगी,रहगुजर कर देगी।

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