मर्द
हमारी रोशनी खा गई,समय की गर्द साहेब।
वर्ना हम भी होते थे कभी,मिशालें मर्द साहेब।
यहां पर गजलों का,मत पूछिए हाल क्या हैं;
काफिया मालूम नहीं,बनते हैं बसीर बद्र साहेब।
माली को फूल से,फूल को भौरों से शिकायत हैं;
ऐसे हालात में अपनों का,कौन बांटेगा दर्द साहेब।
उम्रभर के तजुर्बे को,बच्चों ने ख़ाक बताया हैं;
इस तरह बुढ़ापा घरों में,हो रहा है फर्द साहेब।
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