आसरा

 तू साथ होता तो,मत पूछ"मैं क्या बन जाता।

मेरा दर्द ही मेरे जीने का,आसरा बन जाता।


मैं नहीं जानता उसकी,रहमत में कितना दम हैं;

मगर तू साथ चलता तो,यकीनन खुदा बन जाता।


यू तो मेरी तकलीफ़ मुझपर,बहुत भारी गुजरी हैं;

तू समा लेता गोद में तो,मैं बहुत हल्का बन जाता।


छुछुंदर क्या कुचलेंगे भला,फन विषधर नागों का;

सागर सूखता भी तो,साहेब"इक दरिया बन जाता।

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