जी नहीं लगता
महफ़िल हो या मयखानें में,कहीं नहीं लगता।
बगैर तेरे सनम मेरा,अब ये जी नहीं लगता।
उकेरा हैं जिसे मैंने अपनी,मोहब्बत के कलाम में;
बदला हैं इस कदर की,तू अब वही नहीं लगता।
उसे बयां की क्या जरूरत हैं,तू जिसके साथ हैं;
अगर पास हीरा हो,तो"कौन जौहरी नहीं लगता।
और मेरी फिक्र में तुमसें,परेशां भी नहीं हुआ जाता;
मोहब्बत क्या ये रिश्ता तो"दोस्ती भी नहीं लगता।
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