इख्तियार

 अब तो"धोखे पर भी,इख्तियार कर लेता हूं।

तेरे बाद मैं,पत्थर से भी प्यार कर लेता हूं।


इतना तो सिखाया हैं, मुझें तेरी मोहब्बत ने;

रोज उजरता हुं,और नजरें चार कर लेता हूं।


मलाल किसी बात का, मुझें अब रहता नही;

दिल से खेलता हूं,दिल का व्यापार कर लेता हूं।


जमानें के हिसाब से, ढल गया हुं शायद;

अब रिश्तों में,मैं पीठ पर भी वार कर लेता हूं।


और गिरकर उठने का,जबसे हैं भरोसा आया;

लोगों को गिराकर मैं, मज़ा यार कर लेता हूं।

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