दिल की आग

 दिल की आग को,भला पैरों से बुझाता हैं कोई।

अब तेरे बाद दिल में,न आता जाता हैं कोई।


गिरकर मीनार से,फिर खबर कौन मीनार की लें;

सहारा देकर कहां किसी को,अब उठाता हैं कोई।


अभी उम्र बाकी हैं,माना"तुझमें बहुत रौनक हैं;

पर"ये किसकी विरासत हैं,जो इतराता हैं कोई।


बेखबर होकर भी"तुम, मुझें इतने अच्छें लगते हो;

जैसें चांद देखने को छत पे,रात बिताता हैं कोई।


ख्वाईश औकाद से बाहर हो,तो"निकल जायेंगे;

मगर"अपनें दीवाने को,बुरा तो"न बताता हैं कोई।

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